नई दिल्ली। दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने मंगलवार को बताया कि उसके फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर (एफआरआई) ने शुरू होने के सिर्फ 15 महीनों के भीतर देश में 5,000 करोड़ रुपए से अधिक की संभावित साइबर धोखाधड़ी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।विभाग के अनुसार, 22 मई 2025 को शुरू किए गए इस तंत्र के जरिए अगस्त 2026 तक कुल 5,043.73 करोड़ रुपए की संदिग्ध वित्तीय हानि को रोका गया है। तुलना करें तो अगस्त 2025 तक यह आंकड़ा केवल 139.16 करोड़ रुपए था, जो इस प्रणाली की बढ़ती प्रभावशीलता को दर्शाता है।
संचार मंत्रालय ने कहा कि केवल अप्रैल 2026 से अगस्त 2026 के बीच चार महीनों में ही 2,000 करोड़ रुपए से अधिक की संभावित साइबर ठगी को रोका गया। विभाग के मुताबिक, यह वह धनराशि है जो नागरिकों के खातों से बाहर जाने से पहले ही बचा ली गई, इसलिए बाद में उसे खोजने, खातों को फ्रीज करने या वापस हासिल करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
डीओटी द्वारा विकसित फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर एक ऐसा जोखिम मूल्यांकन ढांचा है जो वित्तीय संस्थानों को वास्तविक समय में यह पहचानने में मदद करता है कि कोई मोबाइल नंबर साइबर अपराध या वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा हो सकता है या नहीं। यह प्रणाली डीओटी के डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (डीआईपी) के माध्यम से संचालित होती है, जो मोबाइल नंबरों को वित्तीय धोखाधड़ी में संभावित संलिप्तता के आधार पर मध्यम, उच्च और अत्यधिक उच्च जोखिम वाली श्रेणियों में वर्गीकृत करती है।
इस जोखिम मूल्यांकन के लिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं का उपयोग किया जाता है। इनमें संचार साथी प्लेटफॉर्म पर नागरिकों द्वारा दी गई शिकायतें, भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से प्राप्त जानकारी, दूरसंचार कंपनियों, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा साझा किए गए आंकड़े शामिल हैं। इन जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर जोखिम संकेत तैयार किए जाते हैं।
डीआईपी से प्राप्त खुफिया जानकारी को सुरक्षित तरीके से बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं, बीमा कंपनियों, प्रतिभूति बाजार से जुड़े संस्थानों तथा पेंशन क्षेत्र की इकाइयों के साथ साझा किया जाता है। ये संस्थान इन जोखिम संकेतों को अपने ग्राहक सत्यापन, लेनदेन निगरानी और धोखाधड़ी पहचान तंत्र में शामिल करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप किसी भी संदिग्ध लेनदेन की पहचान राशि स्थानांतरित होने से पहले ही की जा सकती है।
दूरसंचार विभाग का कहना है कि यह व्यवस्था पारंपरिक प्रतिक्रिया-आधारित प्रणाली से अलग है। पहले धोखाधड़ी हो जाने के बाद धन की खोज, खातों को फ्रीज करने और राशि वापस लाने की प्रक्रिया शुरू होती थी। लेकिन अब संभावित जोखिम की पहचान भुगतान शुरू होने के क्षण में ही हो जाती है।
विभाग के अनुसार, साइबर अपराधों में शामिल लोग अक्सर चोरी की गई राशि को बहुत कम समय में कई फर्जी खातों या तथाकथित 'म्यूल अकाउंट्स' में स्थानांतरित कर देते हैं, जिससे धन वापस हासिल करना बेहद कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, एफआरआई-आधारित जांच एक सेकंड से भी कम समय में पूरी की जा सकती है और संदिग्ध लेनदेन को शुरुआत में ही रोक सकती है।




