नई दिल्ली। फ्रांस के बाद पुर्तगाल में चेहरा ढंकने को लेकर एक बड़ा प्रतिबंध लागू किया है। दरअसल, देश की सेगुरो सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। इस नए प्रतिबंध का पालन ना करने पर 150 यूरो से 3,000 यूरो (भारतीय करेंसी में 17 हजार से 3.35 लाख रुपए) तक जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।सरकार के इस कदम को बुर्का पहनने वाली महिलाओं पर निशाने के तौर पर देखा जा रहा है। विदेशी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति एंटोनियो जोसे सेगुरो ने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू किया है। हालांकि, कुछ मामलों में इस प्रतिबंध से रियायतें दी गई है। स्वास्थ्य, पेशेवर, कलात्मक या मौसम संबंधी कारणों के साथ-साथ धार्मिक स्थलों, राजनयिक मिशनों और विमानों में इस प्रतिबंध से छूट दी गई है।

पुर्तगाल के प्रेसिडेंट एंटोनियो जोस सेगुरो ने मंगलवार देर रात एक बयान में कहा, "चेहरे को मानव पहचान और संचार का एक केंद्रीय तत्व माना जाना चाहिए।" पुर्तलाग की स्थानीय मीडिया के अनुसार, इस कानून को जुलाई में संसद ने सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी गठबंधन और धुर दक्षिणपंथी दलों के समर्थन से मंजूरी दी थी।

वामपंथी दलों ने इसके खिलाफ मतदान किया था। यह कानून सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छिपाने या पहचान रोकने के लिए डिजाइन किए गए कपड़ों पर प्रतिबंध लगाता है। यह लिंग, धर्म, उम्र या मूल से संबंधित कारणों से किसी को अपना चेहरा ढकने से प्रतिबंधि करता है।

यूरो न्यूज के अनुसार, धुर-दक्षिणपंथी चेगा पार्टी द्वारा लाए गए इस विधेयक को पुर्तगाली बार एसोसिएशन, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ऑफिस की हाई काउंसिल और पुर्तगाली महिला वकीलों के एसोसिएशन से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। इन संस्थाओं ने इसके असंवैधानिक होने की आशंका भी जताई है।

सेंटर-लेफ्ट की सोशलिस्ट पार्टी (पीएस), ग्रीन-लेफ्ट की लिवरे और पुर्तगाली कम्युनिस्ट पार्टी (पीसीपी) ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और चेतावनी दी कि इससे इस्लामोफोबिया बढ़ सकता है। वहीं, सेंटर-राइट की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (पीएसडी) ने इसका समर्थन किया है।

पीएस ने कहा कि "विधेयक के व्याख्यात्मक ज्ञापन में इस्लामोफोबिक उद्देश्य स्पष्ट था, जिस कट्टरपंथी माहौल में हम रह रहे हैं और इससे सीधे तौर पर निशाना बनाए जा रहे समुदायों के लिए जो जोखिम पैदा हो रहे हैं, वह निंदनीय है।"

वहीं, पीसीपी ने कहा कि इस प्रस्ताव का न तो महिला अधिकारों से कोई संबंध है और न ही सुरक्षा से, बल्कि इसका मकसद सिर्फ अलग दिखने वालों के खिलाफ नफरती भाषण और हिंसा को बढ़ावा देना और नस्लवादी व जेनोफोबिक सोच को हवा देना है।

बता दें, फ्रांस ने साल 2010 में संसद से इस कानून को पास किया और अप्रैल 2011 से इसे पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू कर दिया गया।