प्रशासन ने जारी किया नोटिस -खुद को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य कैसे घोषित कर रहे

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प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) के मुख्य स्नान पर्व के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच शुरू हुआ विवाद अब काफी गहरा गया है। यह विवाद शुरू में उनके संगम स्नान और शोभायात्रा को लेकर था, जहां प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के कारण उन्हें रोका, जिससे धक्का-मुक्की और मारपीट के आरोप लगे। स्वामी जी ने स्नान नहीं किया और धरना शुरू कर दिया, साथ ही प्रशासन से माफी की मांग की।
इसके बाद मंगलवार (20 जनवरी 2026) को माघ मेला प्राधिकरण ने उन्हें नोटिस जारी किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए पूछा गया कि वे खुद को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य कैसे घोषित कर रहे हैं। नोटिस में कहा गया कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर नियुक्ति (पट्टाभिषेक) पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई है, मामला विचाराधीन है, इसलिए कोई भी खुद को आधिकारिक रूप से शंकराचार्य नहीं घोषित कर सकता। उनके शिविर में लगे बोर्ड पर "ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य" लिखे होने को कोर्ट आदेश की अवहेलना बताया गया, और 24 घंटे में जवाब मांगा गया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस नोटिस का तीखा जवाब दिया है। उन्होंने 24 घंटे के अंदर ही 8 पेज का विस्तृत जवाब (मुख्य रूप से अंग्रेजी में) ई-मेल और मेला प्रशासन के दफ्तर में भेज दिया। उनके वकील (सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा) के माध्यम से दिया गया यह जवाब नोटिस को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण, असंवैधानिक और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताता है। मुख्य बिंदु:
सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाभिषेक (अभिषेक समारोह) पर रोक लगाई है, लेकिन "शंकराचार्य" पदवी के उपयोग पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है।
मामला कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए किसी तीसरे पक्ष (जैसे प्रशासन) को टिप्पणी करने या रोक लगाने का अधिकार नहीं।
वे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और वसीयत के आधार पर यह पद संभाल रहे हैं। द्वारका और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों ने भी उन्हें शंकराचार्य के रूप में मान्यता दी है।
नोटिस वापस लेने की चेतावनी दी गई है, अन्यथा मानहानि, कोर्ट अवमानना और अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इससे शंकराचार्य की छवि और हिंदू आस्था को ठेस पहुंच रही है।
यह विवाद ज्योतिष पीठ (ज्योतिरमठ, बद्रीनाथ) के शंकराचार्य पद पर लंबे समय से चले आ रहे विवाद से जुड़ा है, जहां 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाभिषेक पर स्टे दिया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद को वैध शंकराचार्य मानते हैं, जबकि प्रशासन और कुछ पक्ष इसे मान्यता नहीं देते।
वर्तमान में स्वामी जी धरने पर बैठे हैं, और यह मामला राजनीतिक रंग भी ले रहा है, जहां कांग्रेस ने इसे सरकार की असहिष्णुता बताया है। स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है, और आगे कोर्ट या प्रशासन की ओर से कोई बड़ा फैसला आ सकता है।
