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न्याय तभी सार्थक होता है, जब वह सभी के लिए समान और निष्पक्ष हो

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27 जनवरी 2026, 09:04 am IST
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नई दिल्ली। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता विनियम, 2026 से राजनीतिक तूफान शुरू हो गया है। दिल्ली में नए नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा है। सवर्ण समुदायों के छात्रों ने मंगलवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के हेडक्वार्टर के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। बढ़ते विवाद के बीच यूनिटी का आह्वान करते हुए छात्र समूहों ने अपने साथियों से नए नियमों का विरोध दर्ज कराने के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने की अपील की है।


इसके अलावा यूपी में भी कई जगहों पर सोमवार को विरोध प्रदर्शन हुए और मंगलवार को भी प्रदर्शन के लिए बुलाया गया है। नियमों से जुड़ा गैजेट इस महीने की शुरुआत में नोटिफाई किया गया था। ये नियम विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए मजबूत सिस्टम बनाने का आदेश देते हैं। वहीं, दूसरी तरफ कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ये एकतरफा और अस्पष्ट हैं, इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। सरकार द्वारा जारी किया गया यह नोटिफिकेशन विरोध प्रदर्शन, इस्तीफों और राजनीतिक बेचैनी की वजह बनता जा रहा है। मामले पर बीजेपी अंदर उठापटक मची है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आलोचकों ने इन दोनों इस्तीफों को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया है कि यूजीसी नियमों का विरोध सिर्फ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और राजनीतिक सिस्टम में भी पहुंच गया है। यूजीसी ने सभी हायर एजुकेशन संस्थानों के लिए भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी और 24 घंटे शिकायत हेल्पलाइन बनाना जरूरी कर दिया है, खासकर एससी, एसटी और ओबीसी स्टूडेंट्स के लिए। यूजीसी का कहना है कि इन नियमों का मकसद कैंपस में निष्पक्षता और सबको शामिल करना है। इसी नियम को लेकर कुछ लोग विरोध कर रहे हैं।


नए नियमों का विरोध करने वाले लोग ये तर्क दे रहे हैं कि जारी किए गए नए नियम भेदभाव के आरोपियों के लिए सुरक्षा उपायों को साफ तौर पर परिभाषित नहीं करते हैं। इनसे दोषी मानने की धारणा बनने का खतरा है, खासकर जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स और फैकल्टी के खिलाफ। नियमों का पालन न करने पर संस्थानों को मान्यता रद्द होने या फंडिंग बंद होने समेत सजा का सामना करना पड़ सकता है।


बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजय सिंह ने एक पोस्ट में न्याय, निष्पक्षता और संतुलित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि न्याय तभी सार्थक होता है, जब वह सभी के लिए समान और निष्पक्ष हो। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि मौजूदा हालात से शिक्षण संस्थानों में चिंता और आशंका का माहौल बन रहा है। बिना संतुलित प्रतिनिधित्व के बनाई गई समितियां न्याय नहीं कर सकतीं। ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक फैसले देती हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता।


संजय सिंह ने अपने पोस्ट में पीएम मोदी से आग्रह किया है कि न्याय के पथ पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा तय की जानी चाहिए। फैसले प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, जिससे किसी भी तरह की असमानता न रहे। बीजेपी नेता ब्रज भूषण सिंह के बेटे और गोंडा से विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने कहा कि इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना होनी चाहिए। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि इस एक्ट से देश में जातिगत तनाव और झगड़े बढ़ सकते हैं1 सरकार चाहती है कि देश जातिवाद, धर्मवाद और मुकदमों में बंटा रहे। इस कानून का असर आने वाले समय में दिखाई देगा, लेकिन ऐसे कदम समाज में जातिगत दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं। इस तरह के फैसले देश की एकता के लिए ठीक नहीं हैं।


केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने इस पर सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया कि नियमों की समीक्षा की जाएगी या उन्हें रोका जाएगा। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है और नियमों का मकसद समानता को बढ़ावा देना है, न कि टकराव को। हालांकि, सलाह-मशविरे या संभावित संशोधनों के लिए कोई समय-सीमा नहीं बताई है।

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