नई दिल्ली। भारत-थाईलैंड संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘मैत्री-15’ में इस बार युद्धाभ्यास सिर्फ हथियारों और रणनीति का ही नहीं है बल्कि दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की युद्धकला, नजदीकी लड़ाई की तकनीक और आतंकवाद रोधी अभियानों का अनुभव भी साझा कर रहे हैं। अभ्यास के दौरान रॉयल थाई सेना ने अपनी प्रसिद्ध मुए थाई युद्धकला का प्रदर्शन किया, तो वहीं भारतीय सेना ने जवाब में अपनी आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन (एएमएआर) का प्रदर्शन किया।
मुए थाई के प्रदर्शन के बाद भारतीय सैनिकों ने एएमएआर के जरिए नजदीकी मुकाबले और आत्मरक्षा की तकनीकों को दिखाया। इस आदान-प्रदान में दोनों सेनाओं की शारीरिक क्षमता, अनुशासन, आत्मविश्वास और युद्ध के लिए तत्परता साफ नजर आई। युद्धाभ्यास में भारतीय सेना ने अपने वास्तविक परिचालन अनुभव को भी थाई सैनिकों के साथ साझा किया। सैनिकों ने मोबाइल वाहन जांच चौकी, घेराबंदी और तलाशी अभियान तथा आतंकी ठिकानों में प्रवेश जैसी परिस्थितियों का संयुक्त अभ्यास किया।
दरअसल अर्ध-शहरी इलाकों में आतंकवाद रोधी अभियानों के दौरान सैनिकों को बेहद तेजी से स्थिति को समझकर फैसला लेना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अभ्यास में आपसी तालमेल, सामरिक सटीकता, सतर्कता और खतरे के सामने त्वरित प्रतिक्रिया पर विशेष जोर दिया गया। आतंकवाद रोधी अभियानों में आईईडी यानी तात्कालिक विस्फोटक उपकरण एक गंभीर खतरा होते हैं। मैत्री-15 में दोनों सेनाओं ने ऐसे उपकरणों की पहचान और उनसे सुरक्षित तरीके से निपटने की प्रक्रियाओं का भी अभ्यास किया।
सैनिकों ने संभावित विस्फोटक खतरे को पहचानने, स्थिति का आकलन करने और सुरक्षित एवं प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया देने से जुड़ी प्रक्रियाएं साझा कीं। मैत्री-15 का आयोजन 18 से 31 अगस्त 2026 तक थाईलैंड के सूरतथानी स्थित विभावदी रंगसित शिविर में किया जा रहा है। अभ्यास में भारतीय सेना और रॉयल थाई सेना के 85-85 सैनिक, यानी कुल 170 सैन्यकर्मी हिस्सा ले रहे हैं। भारतीय दल में गोरखा राइफल्स के सैनिक शामिल हैं, जबकि थाईलैंड की ओर से 25वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की 3वीं बटालियन हिस्सा ले रही है।
इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य कंपनी स्तर पर उग्रवाद और आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए दोनों सेनाओं की संयुक्त क्षमता और आपसी तालमेल बढ़ाना है। मुए थाई और एएमएआर के प्रदर्शन से लेकर आईईडी की पहचान, घेराबंदी और तलाशी तथा कमरों में कार्रवाई तक, मैत्री-15 दोनों सेनाओं को एक-दूसरे के युद्ध कौशल और परिचालन अनुभव को करीब से समझने का अवसर दे रहा है।




