महात्मा गांधी पुण्यतिथि 2026: सादगी, संघर्ष और शहादत की अनकही कहानी; जब बापू ने कहा 'हे राम'

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Mahatma Gandhi Death Anniversary 2026: 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...' यह पंक्तियाँ आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति कृतज्ञता जगा देती हैं। आज 30 जनवरी 2026 को पूरा देश बापू के बलिदान दिवस पर उन्हें नमन कर रहा है, जिसे हम शहीद दिवस (Martyr's Day) के रूप में मनाते हैं।
आज ही के दिन मानवता के इस महान पुजारी ने 'हे राम' कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। बापू का जीवन मोहनदास से 'महात्मा' बनने की वह तपस्या है जिसने दुनिया को सिखाया कि प्रेम और अहिंसा की शक्ति किसी भी परमाणु बम से बड़ी होती है। आइए, उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनके जीवन के वे पन्ने, जो आज भी प्रेरणा और विवादों के बीच सत्य की गवाही देते हैं।
मोहनदास से 'महात्मा' बनने का सफर
2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी बचपन से ही सत्यवादी थे। 1888 में लंदन जाकर कानून की पढ़ाई की और बैरिस्टर बने। लेकिन उनके जीवन का असली टर्निंग पॉइंट 1893 में दक्षिण अफ्रीका जाना रहा। वहां हुए नस्लवाद ने उन्हें अहिंसा को एक 'वैश्विक हथियार' बनाने की प्रेरणा दी। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के जरिए उन्होंने भारत में किसानों को न्याय दिलाया, जिसके बाद अल्बर्ट आइंस्टीन ने उन्हें "दुनिया का सबसे शानदार राजनीतिज्ञ" कहा था।
दांडी यात्रा: जब एक मुट्ठी नमक ने हिला दी ब्रिटिश हुकूमत
ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी नमक कानून के विरोध में गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ पदयात्रा शुरू की।
दूरी: 241 मील (लगभग 390 किमी) की यात्रा।
उद्देश्य: 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर नमक कानून तोड़ना।
असर: इस आंदोलन ने पूरे देश में सविनय अवज्ञा की ज्वाला भड़का दी। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की रिपोर्टिंग ने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आक्रोश पैदा किया, जिससे ब्रिटिश सत्ता को बातचीत की मेज पर झुकना पड़ा।
महात्मा गांधी पुण्यतिथि 2026: सादगी, संघर्ष और शहादत की अनकही कहानी; जब बापू ने कहा 'हे राम'
Mahatma Gandhi Death Anniversary 2026: 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...' यह पंक्तियाँ आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति कृतज्ञता जगा देती हैं। आज 30 जनवरी 2026 को पूरा देश बापू के बलिदान दिवस पर उन्हें नमन कर रहा है, जिसे हम शहीद दिवस (Martyr's Day) के रूप में मनाते हैं।
आज ही के दिन मानवता के इस महान पुजारी ने 'हे राम' कहते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। बापू का जीवन मोहनदास से 'महात्मा' बनने की वह तपस्या है जिसने दुनिया को सिखाया कि प्रेम और अहिंसा की शक्ति किसी भी परमाणु बम से बड़ी होती है। आइए, उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनके जीवन के वे पन्ने, जो आज भी प्रेरणा और विवादों के बीच सत्य की गवाही देते हैं।
मोहनदास से 'महात्मा' बनने का सफर
2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी बचपन से ही सत्यवादी थे। 1888 में लंदन जाकर कानून की पढ़ाई की और बैरिस्टर बने। लेकिन उनके जीवन का असली टर्निंग पॉइंट 1893 में दक्षिण अफ्रीका जाना रहा। वहां हुए नस्लवाद ने उन्हें अहिंसा को एक 'वैश्विक हथियार' बनाने की प्रेरणा दी। 1917 में चंपारण सत्याग्रह के जरिए उन्होंने भारत में किसानों को न्याय दिलाया, जिसके बाद अल्बर्ट आइंस्टीन ने उन्हें "दुनिया का सबसे शानदार राजनीतिज्ञ" कहा था।
दांडी यात्रा: जब एक मुट्ठी नमक ने हिला दी ब्रिटिश हुकूमत
ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी नमक कानून के विरोध में गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ पदयात्रा शुरू की।
दूरी: 241 मील (लगभग 390 किमी) की यात्रा।
उद्देश्य: 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर नमक कानून तोड़ना।
असर: इस आंदोलन ने पूरे देश में सविनय अवज्ञा की ज्वाला भड़का दी। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की रिपोर्टिंग ने ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आक्रोश पैदा किया, जिससे ब्रिटिश सत्ता को बातचीत की मेज पर झुकना पड़ा।
गांधी का निर्णय और पटेल का त्याग: राष्ट्र निर्माण की मिसाल
स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के चयन में बापू की भूमिका आज भी चर्चा का विषय रहती है। 1946 में कांग्रेस समितियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, गांधी जी का मानना था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू का अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण नए भारत के लिए आवश्यक है। बापू के एक इशारे पर पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया। यह त्याग भारतीय राजनीति के इतिहास में अतुलनीय है, जिसके बाद नेहरू-पटेल की जोड़ी ने 562 रियासतों का विलय कर अखंड भारत का निर्माण किया।
बापू के चुनौतीपूर्ण निर्णय और जनमानस की असहमति
एक 'महात्मा' होने के बावजूद गांधी जी के कुछ निर्णयों पर हमेशा वैचारिक मतभेद रहे:
चौरी-चौरा कांड: हिंसा के बाद असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लेना, जिससे कई क्रांतिकारी निराश हुए।
भगत सिंह की फांसी: युवाओं का एक वर्ग मानता था कि गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रोकने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बनाया गया।
पाकिस्तान को सहायता: विभाजन के समय पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाने के लिए उनका अनशन भी विवादों में रहा।
हत्या से पहले बापू पर हुए 5 असफल हमले
30 जनवरी 1948 की शाम से पहले भी काल ने कई बार बापू को घेरने की कोशिश की थी:
25 जून 1934: पुणे में उनकी कार पर ग्रेनेड फेंका गया।
जुलाई 1944: पंचगनी में नाथूराम गोडसे ने खंजर लेकर उन पर हमला करने की कोशिश की।
सितंबर 1944: सेवाग्राम में फिर से गोडसे ने चाकू के साथ उन्हें रोकने का प्रयास किया।
29 जून 1946: बापू की ट्रेन को पटरी से उतारने की साजिश रची गई।
20 जनवरी 1948: बिरला हाउस में मदनलाल पाहवा ने बम फोड़ा, जो हत्या की आखिरी चेतावनी थी।
'हे राम': वह आखिरी शाम और देश का अंधेरा
30 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस में नाथूराम गोडसे की तीन गोलियों ने बापू के भौतिक शरीर को शांत कर दिया। उनके मुख से निकले अंतिम शब्द 'हे राम' आज भी सहनशीलता का प्रतीक हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने रोते हुए राष्ट्र से कहा था— "हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और हर तरफ अंधेरा है।" भले ही बापू शहीद हो गए, लेकिन उनकी अहिंसा आज भी विश्व शांति का एकमात्र मार्ग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 30 जनवरी को कौन सा दिवस मनाया जाता है? 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि की स्मृति में 'शहीद दिवस' (Martyr's Day) मनाया जाता है।
2. महात्मा गांधी की हत्या किसने और कब की थी? महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में नाथूराम गोडसे ने की थी।
3. गांधी जी के साबरमती आश्रम से दांडी तक की यात्रा में कितने दिन लगे थे? इस ऐतिहासिक पदयात्रा में कुल 24 दिन लगे थे।
