नई दिल्ली। विदेश मंत्रालय के एक हालिया बयान ने देश में नागरिकता के कानूनी प्रमाण को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी है। मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार करने के बाद अब यह बड़ा यक्ष प्रश्न जनता के सामने है कि आखिर वह कौन सा दस्तावेज है जो किसी व्यक्ति को प्रामाणिक रूप से भारतीय साबित करता है। कानूनी सूत्रों का कहना है कि पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। यही कारण है कि विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने इसे महज एक यात्रा दस्तावेज (ट्रेवल डॉक्यूमेंट) माना है। इस तर्क को बंबई उच्च न्यायालय के साल 2013 के उस फैसले से भी बल मिलता है, जिसमें साफ कहा गया था कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं है, हालांकि इलेक्शन कमीशन ने इसे एसआईआर के लिए वैध माना है।
इस उलझन के बीच नागरिकता साबित करने के अन्य विकल्पों और संवैधानिक प्रावधानों पर भी नजर डाली जा रही है। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा 20 दिसंबर 2019 को जारी की गई एक जानकारी के मुताबिक, जन्म की तारीख और जन्म स्थान से जुड़े प्रामाणिक दस्तावेज जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है, हालांकि ऐसे दस्तावेजों की अंतिम सूची पर अभी पूर्ण फैसला होना बाकी है। कानूनी तौर पर भारतीय नागरिकता का निर्धारण भारतीय संविधान और सिटीजनशिप एक्ट 1955 के नियमों के तहत किया जाता है, जिसके अंतर्गत जन्म, वंश, पंजीकरण और देशीयकरण द्वारा नागरिकता हासिल की जा सकती है। इस विषय पर सियासी हलकों से भी तीखी प्रतिक्रिया आई है, जहां राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया है कि यदि नागरिकता का कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं होगा, तो बीएलओ किसी भी नागरिक पर शक कर उसे वोट देने से रोक सकता है।
नागरिकता के इस कानूनी विवाद के बीच आम जनता की जेब पर एक और बोझ बढ़ गया है। सरकार ने पासपोर्ट बनवाने की फीस में भारी बढ़ोतरी कर दी है। अब 36 पन्नों के नए सामान्य पासपोर्ट को बनवाने के लिए उपभोक्ताओं को 1500 रुपये के स्थान पर 2500 रुपये की बढ़ी हुई फीस देनी होगी। इसके साथ ही, आपातकालीन स्थिति में बनाई जाने वाली तत्काल पासपोर्ट सेवा के लिए अब सीधे 5 हजार रुपये का भुगतान करना होगा।



