भोपाल। आमतौर पर केरल का स्वास्थ्य मॉडल देश में सबसे बेहतर माना जाता है, लेकिन ताजा आंकड़ों ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। लोकसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार, केरल में एक व्यक्ति को साल भर में इलाज पर औसतन 7,889 रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश में यह खर्च महज 1,739 रुपये है। यानी एमपी में इलाज केरल की तुलना में करीब चार गुना सस्ता पड़ रहा है।
इसके बावजूद मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं पर कुल खर्च का 43.3 प्रतिशत हिस्सा अभी भी आम जनता को अपनी जेब से या उधार लेकर वहन करना पड़ रहा है। केरल में यह आंकड़ा 59.1 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में स्थिति और खराब है जहां लोग इलाज का 63.7 प्रतिशत खर्च खुद उठा रहे हैं।
10 साल पहले की तुलना में मध्यप्रदेश में स्थिति में काफी सुधार हुआ है। वर्ष 2014-15 में प्रदेश में इलाज पर कुल खर्च का 72 प्रतिशत पैसा लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता था। उस समय प्रति व्यक्ति जेब से खर्च 1,808 रुपये था। अब यह घटकर 43.3 प्रतिशत रह गया है और प्रति व्यक्ति वार्षिक खर्च 1,739 रुपये हो गया है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पिछले 7-8 वर्षों में विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं, मुफ्त दवा व जांच सुविधाओं और सरकारी अस्पतालों के विस्तार ने इस बोझ को काफी हद तक कम किया है। देश के राष्ट्रीय औसत के मुताबिक एक व्यक्ति को इलाज पर अपनी जेब से औसतन 2,600 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जबकि मध्यप्रदेश में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी कम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि जेब से खर्च में कमी आई है, लेकिन अभी भी 43 प्रतिशत का बोझ काफी बड़ा है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, ज्यादा संख्या में डॉक्टरों-स्टाफ की भर्ती और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के सुदृढ़ीकरण से इस प्रतिशत को और कम किया जा सकता है।
ये आंकड़े मध्यप्रदेश सरकार के लिए एक सकारात्मक संकेत जरूर हैं, लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी भी चुनौतियां बाकी हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में गुणवत्तापूर्ण इलाज सुनिश्चित करने की।

