Sunday, January 18, 2026

LOGO

BREAKING NEWS
लाइफ्स्टाइलडेरी सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकती हैं सिंथेटिक गाय की नस्ल

डेरी सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकती हैं सिंथेटिक गाय की नस्ल

Post Media
News Logo
Peptech Time
18 जनवरी 2026, 10:08 am IST
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter/XOpen Instagram
Copy Link

Advertisement

करण फ्राइज डेरी सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकती है। यह एक सिंथेटिक गाय की नस्ल है, जिसे खासतौर पर ज्यादा दूध उत्पादन और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। करण फ्राइज गाय एक दुग्ध उत्पादन सीजन, जो औसतन 10 महीने का होता है, उसमें करीब 3,550 किलोग्राम दूध देती है। वहीं, बेहतर प्रदर्शन करने वाली गायें 305 दिनों के दुग्ध काल में करीब 5,851 किलोग्राम तक दूध देने में सक्षम पाई गई हैं। रो औसतन 11 से 19 किलोग्राम दूध देने वाली इस नस्ल की अधिकतम दैनिक उपज 46.5 किलोग्राम तक दर्ज की गई है, जो भारतीय प्रबंधन प्रणालियों के तहत इसकी उल्लेखनीय आनुवंशिक क्षमता को दर्शाती है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस नस्ल को हरियाणा के करनाल स्थित राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। करण फ्राइज को विदेशी होल्स्टीन फ्राइजियन और भारत की स्वदेशी जेबू नस्ल की थारपारकर गाय के नियंत्रित प्रजनन से तैयार किया गया है। होल्स्टीन फ्राइजियन नस्ल विश्व स्तर पर अपनी उच्च दूध उत्पादन क्षमता के लिए जानी जाती है, जबकि थारपारकर गायें कठोर जलवायु सहने, रोग प्रतिरोधक क्षमता और भारतीय परिस्थितियों में टिकाऊ प्रदर्शन के लिए मशहूर हैं। इन दोनों के गुणों को मिलाकर एक ऐसी नस्ल तैयार की गई है, जो ज्यादा दूध देने के साथ-साथ स्थानीय माहौल में भी बेहतर ढंग से अनुकूल हो सके।


भारत की स्वदेशी गायों की औसत दूध उपज सामान्यतः 3 से 4 किलोग्राम प्रतिदिन के आसपास होती है, जबकि विदेशी नस्लों में यह आंकड़ा 8 से 12 किलोग्राम प्रतिदिन तक होता है। एक दुग्ध सीजन में स्वदेशी गायें औसतन 1,000 से 2,000 किलोग्राम दूध देती हैं। ऐसे में करण फ्राइज जैसी सिंथेटिक नस्लें देश में दूध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं, खासकर तब जब डेरी उद्योग को बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करना है। हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने करण फ्राइज गाय की नस्ल को आधिकारिक पंजीकरण प्रमाण पत्र प्रदान किया। यह प्रमाण पत्र भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया गया।


पंजीकरण पाने वाली नई नस्लों में अधिकांश स्वदेशी हैं, जिनमें अलग-अलग राज्यों की गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी, बत्तख और मिथुन जैसी किस्में शामिल हैं। वहीं राजस्थान की एक सिंथेटिक भेड़ नस्ल ‘अविशान’ को भी मान्यता दी गई है। वृंदावनी नस्ल को यूपी के बरेली स्थित आईसीएआर-भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने विकसित किया है, जिसमें विदेशी नस्लों के साथ स्वदेशी हरियाना मवेशियों का मिश्रण है। एनडीआरआई करनाल के मुताबिक कई पीढ़ियों के अंतःप्रजनन के बाद करण फ्राइज अब एक परिपक्व और स्थिर नस्ल बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नस्ल भविष्य में किसानों की आय बढ़ाने और देश की डेरी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम योगदान दे सकती है।

Today In JP Cinema, Chhatarpur (M.P.)