Monday, January 12, 2026

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मध्य प्रदेश26 वर्षीय मजदूर की मौत से उजड़ा परिवार, मासूम बेटियों को नहीं पता पिता अब इस दुनिया में नहीं

26 वर्षीय मजदूर की मौत से उजड़ा परिवार, मासूम बेटियों को नहीं पता पिता अब इस दुनिया में नहीं

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12 जनवरी 2026, 10:45 am IST
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नौगांव, कमल यादव। नगर से लगभग 26 किलोमीटर दूर ग्राम करहरा निवासी 26 वर्षीय मजदूर मिलन बुनकर की तोरण द्वार हादसे में हुई दर्दनाक मौत ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है। हादसे को चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवार आज भी न्याय और समुचित सहायता की आस लगाए बैठा है।


मृतक मिलन बुनकर अपने परिवार का एकमात्र सहारा था। उनके पिता गोरेलाल बुनकर (65), माता पूनम देवी, पत्नी सोमवती (24) और दो मासूम बेटियां—छवि (3 वर्ष) और रोहिणी (डेढ़ वर्ष)—अब पूरी तरह बेसहारा हो गई हैं। मिलन रोजाना नौगांव जाकर मजदूरी करता था और 400 रुपये की दिहाड़ी से पूरे परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी अचानक हुई मौत से परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट गई है।


परिवार से मुलाकात के दौरान सबसे मार्मिक दृश्य मासूम बेटियों का रहा, जिन्हें अभी तक यह भी नहीं बताया गया है कि उनके पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। मिलन की मां पूनम देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। उन्होंने बताया कि हादसे वाले दिन मिलन सुबह मजदूरी पर जाने से पहले उनके पैर छूकर बोला था कि शाम को लौटकर खाने का इंतजाम करेगा, लेकिन उन्हें क्या पता था कि वह बेटा अब सिर्फ लाश बनकर लौटेगा।


हादसे के चार दिन बाद भी नगर पालिका परिषद नौगांव, संबंधित ठेकेदार या कोई जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवार से मिलने नहीं पहुंचा है। प्रशासन की ओर से केवल कलेक्टर के माध्यम से 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है, जिसे परिवार अपनी जरूरतों के सामने बेहद अपर्याप्त बता रहा है।


पीड़ित परिवार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से न्याय की गुहार लगाई है। उनकी मांग है कि मृतक की पत्नी को स्थायी रोजगार दिया जाए, दोनों बच्चियों के भविष्य के लिए उचित आर्थिक सहायता सुनिश्चित की जाए और तोरण द्वार हादसे के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।


मिलन के घर में एक टोकरी के भीतर लगातार जलता हुआ दीपक परिवार के दर्द और बेटे की यादों का प्रतीक बन गया है। मां पूनम देवी का कहना है कि जब से बेटा गया है, यह दीपक बुझाया नहीं गया, इसी में उन्हें कहीं न कहीं मिलन की झलक दिखाई देती है।


परिवार एक कच्चे मकान में रहने को मजबूर है और आय का कोई स्थायी साधन नहीं बचा है। पिता गोरेलाल बुनकर कहते हैं कि मिलन ही उनका सब कुछ था और अब यह समझ नहीं आ रहा कि वे खुद और अपने पोते-पोतियों का भविष्य कैसे संभालेंगे। पीड़ित परिवार को अब केवल प्रशासन और सरकार से ही न्याय व सहारे की उम्मीद है।

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