बेंगलुरु। इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (आईईएसए) के अध्यक्ष और सेमी इंडिया के अध्यक्ष एवं सीईओ अशोक चंडक ने शुक्रवार को कहा कि भारत को टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए घरेलू चिप डिजाइन क्षमताओं को मजबूत करने और छोटे एवं मध्यम उद्यमों (एसएमई) को ग्रोथ कैपिटल उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिससे वे अपना कारोबार बढ़ा सकें और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।चंडक ने कहा कि भारत का टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर फिलहाल काफी हद तक आयातित उत्पादों और उपकरणों पर निर्भर है, जबकि इस क्षेत्र के लिए घरेलू स्तर पर चिप डिजाइन का काम सीमित है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित सेमीकॉन 2.0 नीति घरेलू चिप डिजाइन और स्वदेशी बौद्धिक संपदा (आईपी) के विकास को प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे 5जी और 6जी दूरसंचार बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। चंडक ने कहा, "दूरसंचार बुनियादी ढांचे का अधिकांश हिस्सा आयातित उत्पादों पर आधारित है। भारत में डिजाइन किए जाने वाले चिप्स की संख्या बहुत कम है या लगभग न के बराबर है।" उन्होंने कहा कि टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों और तकनीकी विशिष्टताओं को समझने से भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप चिप डिजाइन करने में मदद मिलेगी। वहीं, सेमीकॉन 2.0 स्थानीय डिजाइन और बौद्धिक संपदा के विकास को समर्थन दे सकती है। उन्होंने कहा, "सेमीकॉन 2.0 नीति टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन चिप्स के स्थानीय डिजाइन और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के विकास को प्रोत्साहित करेगी और इसमें मदद करेगी।" चंडक ने आगे कहा, "भारत अब एक बिल्कुल अलग चरण में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी नीतियों, उनके सहयोगियों और विभिन्न विभागों के प्रयासों से भारत को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया गया है। अब दुनिया भर की कई कंपनियां और देश भारत पर भरोसा कर रहे हैं।" इंडिया मोबाइल कांग्रेस और सेमीकॉन इंडिया की पूरक भूमिकाओं पर जोर देते हुए चंडक ने कहा कि इंडिया मोबाइल कांग्रेस मुख्य रूप से टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर, उपकरणों, उनकी स्थापना और संबंधित विकास पर केंद्रित है। वहीं, सेमीकॉन इंडिया का उद्देश्य चिप डिजाइन से लेकर विनिर्माण तक, सेमीकंडक्टर की पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है। उन्होंने इन दोनों पहलों को व्यापक प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम के अलग-अलग, लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हुए घटक बताया।
नई दिल्ली। दूरसंचार विभाग (डीओटी) द्वारा विकसित संचार साथी पोर्टल ने मई 2023 में शुरू होने के बाद से 30 करोड़ से अधिक विजिट्स का आंकड़ा पार कर लिया है। संचार मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि यह उपलब्धि दूरसंचार-आधारित धोखाधड़ी और साइबर अपराधों के खिलाफ नागरिकों की बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है।मंत्रालय के अनुसार, संचार साथी अब एक महत्वपूर्ण नागरिक-केंद्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म बन चुका है, जहां लोग संदिग्ध कॉल, एसएमएस और व्हाट्सएप संदेशों की शिकायत दर्ज कर सकते हैं। इसके अलावा, उपयोगकर्ता अपने नाम पर जारी मोबाइल कनेक्शनों की जानकारी जांच सकते हैं, खोए या चोरी हुए मोबाइल फोन को ब्लॉक कर सकते हैं और मोबाइल खरीदने से पहले उसकी प्रामाणिकता भी सत्यापित कर सकते हैं। एक आधिकारिक बयान में सरकार ने बताया कि नागरिकों द्वारा दर्ज की गई प्रत्येक शिकायत दूरसंचार विभाग, बैंकों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए उपयोगी खुफिया जानकारी तैयार करती है। मंत्रालय ने पोर्टल के उपयोगकर्ताओं को "साइबर वॉरियर्स" बताते हुए कहा कि उनकी ओर से साझा की गई जानकारी फर्जी नंबरों, संदिग्ध उपकरणों और नए साइबर ठगी पैटर्न की पहचान करने में मदद करती है, जिससे बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होने से पहले ही रोकथाम संभव हो पाती है। संचार साथी की प्रमुख सेवाओं में से एक 'चक्षु' है, जिसके जरिए लोग फर्जी केवाईसी अपडेट, नकली निवेश योजनाएं, सरकारी अधिकारियों के नाम पर की जाने वाली धोखाधड़ी, फर्जी नौकरी और ऋण ऑफर जैसे संदिग्ध संचार की रिपोर्ट कर सकते हैं। मंत्रालय के मुताबिक, चक्षु प्लेटफॉर्म पर अब तक 12.80 लाख संदिग्ध धोखाधड़ी संबंधी शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इन शिकायतों के आधार पर करीब 59.82 लाख मामलों में कार्रवाई की गई है, जिनमें 50 लाख से अधिक मोबाइल कनेक्शन डिस्कनेक्ट किए गए हैं। पोर्टल का एक अन्य महत्वपूर्ण उपयोग लोगों के नाम पर जारी मोबाइल कनेक्शनों की निगरानी से जुड़ा है। अब तक नागरिकों द्वारा दर्ज 4 करोड़ से अधिक अनुरोधों का निपटारा किया जा चुका है, जिससे चोरी या फर्जी पहचान के आधार पर प्राप्त सिम कार्डों के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिली है। मोबाइल सुरक्षा के क्षेत्र में भी संचार साथी ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। पोर्टल के माध्यम से देशभर में 60.96 लाख खोए या चोरी हुए मोबाइल फोन ब्लॉक किए गए हैं। इनमें से 37.85 लाख मोबाइल ट्रेस किए जा चुके हैं और डीओटी, टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं तथा राज्य पुलिस के समन्वय से 14 लाख से अधिक मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। मंत्रालय ने बताया कि नागरिकों की शिकायतों से प्राप्त जानकारी फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर (एफआरआई) प्रणाली को भी मजबूत बनाती है। यह प्रणाली उन मोबाइल नंबरों के जोखिम का आकलन करती है, जो वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हो सकते हैं। यह खुफिया जानकारी डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (डीआईपी) के माध्यम से बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं, टेलीकॉम कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ साझा की जाती है। इससे संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने और वित्तीय धोखाधड़ी को रोकने में मदद मिलती है।
नई दिल्ली। संचार साथी पोर्टल पर मई 2023 में लॉन्च होने के बाद से कुल विजिट्स की संख्या 30 करोड़ से अधिक हो गई है और इससे 5,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के संदिग्ध साइबर-फ्रॉड से होने वाले नुकसान को रोकने में मदद मिली है। यह जानकारी संचार मंत्रालय की ओर से सोमवार को दी गई।मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इससे 14 लाख से ज्यादा खोए और चोरी हुए हैंडसेट बरामद करने में भी मदद मिली है। साथ ही, इसने अपने नाम पर मौजूद मोबाइल कनेक्शन के बारे में जानने के लिए नागरिकों के 4 करोड़ से ज्यादा अनुरोधों का समाधान किया गया। दूरसंचार विभाग (डीओटी) की ओर से विकसित किया गया यह पोर्टल हर मोबाइल यूजर को आसान और इस्तेमाल में सरल टूल देता है, जिनसे वे संदिग्ध कॉल या मैसेज की रिपोर्ट कर सकते हैं, यह जान सकते हैं कि उनके नाम पर कितने मोबाइल कनेक्शन चल रहे हैं, खोए या चोरी हुए हैंडसेट को ब्लॉक कर सकते हैं, और हैंडसेट खरीदने से पहले यह पता कर सकते हैं कि वह असली है या नहीं। मंत्रालय ने बताया कि पोर्टल पर हर विजिट नागरिक की सुरक्षा करती है और उनके द्वारा रिपोर्ट किया गया हर संदिग्ध कम्युनिकेशन कई अन्य लोगों की सुरक्षा करता है। 'संचार साथी' पर नागरिकों द्वारा दी गई जानकारी को ऐसी काम की जानकारी में बदला जाता है, जिससे डीओटी, बैंकों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को धोखेबाजों को उनके अगले शिकार तक पहुंचने से पहले ही रोकने में मदद मिलती है। इस तरह, 'संचार साथी' का इस्तेमाल करने वाला हर नागरिक एक साइबर वॉरियर और साइबर धोखाधड़ी के खिलाफ एक ढाल के तौर पर काम करता है। संचार साथी पोर्टल को आसान और यूजर-फ्रेंडली सर्विस प्रोसेस के साथ डिजाइन किया गया है। इसमें पब्लिक डैशबोर्ड और टेलीकॉम सुरक्षा, धोखाधड़ी से बचाव और जिम्मेदार डिजिटल तौर-तरीकों के बारे में व्यापक जानकारी शामिल है। अंग्रेजी, हिंदी और 21 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध संचार साथी मोबाइल ऐप नागरिकों को ये सभी सेवाएं उनकी अपनी भाषा में और मोबाइल पर इस्तेमाल करने की सुविधा के साथ देता है।
नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को दुनिया भर में एक परिवर्तनकारी तकनीक माना जा रहा है, जो उत्पादकता बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को नई गति देने की क्षमता रखती है। ग्राहक सेवा, चिकित्सा निदान, कोडिंग और कंटेंट निर्माण जैसे क्षेत्रों में एआई का बढ़ता उपयोग अभूतपूर्व संभावनाएं पैदा कर रहा है। हालांकि, एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तकनीकी क्रांतियां हमेशा तुरंत व्यापक सामाजिक समृद्धि में परिवर्तित नहीं होतीं और एआई के दौर में रोजगार बाजार को लेकर विशेष सतर्कता की आवश्यकता होगी।इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, एआई ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिसे आर्थिक इतिहासकार "एंगेल्स पॉज" कहते हैं। इसका अर्थ है कि उत्पादकता और संपत्ति में तेज वृद्धि तो होती है, लेकिन आम कामगारों की आय और जीवन स्तर में सुधार काफी देर से दिखाई देता है। लेख में ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति का उदाहरण दिया गया है। 19वीं सदी में औद्योगिक उत्पादन में भारी वृद्धि हुई, लेकिन श्रमिकों के जीवन स्तर और आय में सुधार आने में काफी समय लगा। इससे यह संकेत मिलता है कि तकनीकी प्रगति के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचने में समय लग सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछली औद्योगिक क्रांतियों ने बड़े पैमाने पर रोजगार इसलिए पैदा किए क्योंकि उन्होंने पूरी तरह नए उद्योगों को जन्म दिया। वस्त्र उद्योग ने फैक्टरी नौकरियां पैदा कीं, ऑटोमोबाइल उद्योग ने विनिर्माण और सेवाओं में लाखों रोजगार दिए, जबकि डिजिटल क्रांति ने सॉफ्टवेयर, ई-कॉमर्स और प्लेटफॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था विकसित की। एआई भी भविष्य में ऐसे नए पेशे पैदा कर सकता है जिनकी आज कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन संक्रमण का दौर चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह बदलाव और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत ने आईटी आउटसोर्सिंग, बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट और कस्टमर सपोर्ट जैसे श्रम-प्रधान सेवा क्षेत्रों के माध्यम से वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान बनाई है। लेकिन अब बुनियादी कोडिंग, डेटा एंट्री, ग्राहक सहायता और दस्तावेज प्रसंस्करण जैसे कई कार्य एआई द्वारा कम लागत और अधिक गति से किए जा सकते हैं। हालांकि रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि एआई भारत के लिए बड़े अवसर लेकर आया है। कृषि उत्पादकता बढ़ाने, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, लॉजिस्टिक्स को अधिक कुशल बनाने, शिक्षा की पहुंच बढ़ाने और शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाने में एआई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत के कई स्टार्टअप फिनटेक, भाषा प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में एआई आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। लेख के अनुसार, असली चुनौती एआई को अपनाने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि उससे होने वाले उत्पादकता लाभ समाज के बड़े हिस्से तक पहुंचें और केवल कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित न रह जाएं। रिपोर्ट में कहा गया है कि औद्योगिक क्रांति के दौरान सरकारें शुरुआत में श्रमिकों की बिगड़ती स्थिति और बढ़ती असमानता पर पर्याप्त तेजी से प्रतिक्रिया नहीं दे सकीं। बाद में श्रमिक आंदोलनों, श्रम अधिकारों, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक कल्याण नीतियों के माध्यम से संतुलन स्थापित किया गया। लेख का तर्क है कि एआई के युग में भी इसी तरह की संस्थागत तैयारियों की आवश्यकता होगी। नीति निर्माताओं को रोजगार बाजार में बदलाव के लिए पहले से तैयारी करनी होगी, ताकि तकनीकी परिवर्तन सामाजिक अस्थिरता का कारण न बने। रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर डिजिटल शिक्षा, अपस्किलिंग और री-स्किलिंग कार्यक्रमों में निवेश की जरूरत पर जोर दिया गया है। विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों को तेजी से बदलती कौशल आवश्यकताओं के अनुसार अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव करना होगा। साथ ही, तकनीकी बदलाव से प्रभावित होने वाले कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र को भी मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई गई है।
नई दिल्ली। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने कहा है कि भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और सर्कुलर बैटरी इकोसिस्टम विकसित करने के लिए बैटरी निर्माण, उपयोग, सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन और जीवनचक्र समाप्त होने के बाद उनके प्रबंधन (एंड-ऑफ-लाइफ मैनेजमेंट) पर समन्वित रूप से काम करना होगा। उनका कहना है कि केवल इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरियों का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग की व्यापक व्यवस्था विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में टेरी यानी द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने कहा कि बैटरी क्षेत्र पर चर्चा केवल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग के बाद बची हुई क्षमता वाली बैटरियों के सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन की संभावनाओं को भी तलाशना होगा। इससे बैटरियों का उपयोगी जीवन बढ़ाया जा सकेगा और उनकी आर्थिक उपयोगिता अधिकतम की जा सकेगी। इस सम्मेलन में नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और अन्य हितधारकों ने भारत के तेजी से विकसित हो रहे बैटरी इकोसिस्टम से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा की। भारी उद्योग मंत्रालय के संयुक्त सचिव विजय मित्तल ने कहा कि सरकार घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ-साथ सेकंड-लाइफ बैटरियों, ट्रेसबिलिटी, मानकों और रीसाइक्लिंग से जुड़े ढांचे को भी विकसित कर रही है। उनका कहना था कि ऐसे कदम भारत को प्रतिस्पर्धी और सर्कुलर बैटरी अर्थव्यवस्था विकसित करने में मदद करेंगे। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के वैज्ञानिक कुलदीप राणा ने कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों के उपयोग की संभावनाएं केवल इलेक्ट्रिक वाहनों तक सीमित नहीं हैं। उनका उपयोग घरेलू उपकरणों, रूफटॉप सोलर पीवी सिस्टम्स और यूपीएस सिस्टम्स जैसे कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। सम्मेलन में बैटरी वैल्यू चेन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई, जिनमें घरेलू एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) निर्माण क्षमता का विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास और बैटरियों के पुन: उपयोग, पुनर्प्रयोजन तथा रीसाइक्लिंग की बढ़ती जरूरतें शामिल थीं। वहीं, टेरी के वरिष्ठ निदेशक ए.के. सक्सेना ने कहा कि केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के बजाय मूल्य सृजन के स्थानीयकरण पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बैटरियों को शुरुआती चरण से ही सर्कुलर दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। साथ ही सेकंड-लाइफ बैटरियों की शेष क्षमता और प्रदर्शन का आकलन कर उनमें उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाना भी जरूरी है। इसके अलावा, इंडिया एनर्जी स्टोरेज एलायंस (आईईएसए) के प्रबंध निदेशक विनायक वालिम्बे ने देश में मजबूत और प्रतिस्पर्धी बैटरी उद्योग के निर्माण के लिए घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं बीएसईएस राजधनी पावर लिमिटेड की वरिष्ठ प्रबंधक सुगंधिता वाधेरा ने कहा कि भविष्य में बढ़ती बिजली मांग को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए राज्यों को क्षमता नियोजन, मजबूत भुगतान सुरक्षा व्यवस्था और वितरण क्षेत्र में अधिक लचीले ऊर्जा संसाधनों पर काम करना होगा। इससे ऊर्जा तंत्र को अधिक मजबूत और त्वरित प्रतिक्रिया देने योग्य बनाया जा सकेगा।